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Sunday, 11 October 2015

ज़िंदगी मैं तुझे बस ! इतना समझ पाता हूँ

नींद के सपनों मे क्या था
सोचता रह जाता हूँ,
सुबह से शाम तक अनथक,
खोजता रह जाता हूँ ,
रात खाली हाथ लेकर ,
फिर नींद में खो जाता हूँ ,
ज़िंदगी मैं तुझे
बस ! इतना समझ पाता हूँ ।


चैन के सब रास्तों पर
दर्द भीख मांगता है ,
फेर लें नज़रें कहाँ तक
वो हमसे रिश्ता जानता है,
दर्द के साये में हरदम,
दर्द सा, हो जाता हूँ ,
ज़िंदगी मैं तुझे
बस ! इतना ही समझ पाता हूँ ।

अनिल कुमार सिंह