Search This Blog

Sunday, 11 October 2015

दगाबाज मौसम सियासी हो गया

छल गया बार बार
दाल गेहूं चावल को ,
दगाबाज मौसम सियासी हो गया ...
खेती गृहस्थी छोड़
चलावै है रिक्शा ,
गाँव का निरहुवा नगरवासी हो गया ...

बिजली पिशाचिन भई
झलक दिखलाए जाए ,
जलकल बिन जल के उदासी हो गया ...
खेत में फटी बिवाई
दंड भई जुताई बुवाई ,
मूल पचास बियाज़ पचासी हो गया .....
अनिल कुमार सिंह