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Monday, 26 October 2015

ज़िंदगी मैं तुझे बस! इतना ही समझ पाता हूँ.......(II)

.................शेष.....
झूठ के कदमों में पल पल
सत्य मरता कसमें खा कर ,
सत्य को बरबस सुलाते ,
भ्रष्ट कोलाहल सुनाकर ,
झूठ के इन बाज़ारों में
सत्य सा छिप जाता हूँ ,
ज़िंदगी मैं तुझे
बस !इतना ही समझ पाता हूँ .......

ध्येय की ऊंची इमारत
उठती है मुझ को गिरा कर ,
स्वप्न देता हौसले फिर
ज़ख़्मों को सहला सहला कर ,
ध्येय धड़कन के संघर्ष में ,
जीते जी मरा जाता हूँ
ज़िंदगी मैं तुझे
बस! इतना ही समझ पाता हूँ.......
अनिल कुमार सिंह
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