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Saturday, 7 May 2016

जिन्दगी

तूं मुझे अपनी सी सूरत में नज़र आती है,
लिखने वाले तुझ पर नज़्म लिखा करते हैं,
काश! तेरी रूह से गुज़र सकते ये शायर सारे,
बेवजह लफ्ज़ों से, तेरा जिस्म तराशा करते हैं....

अनिल

Thursday, 5 May 2016

लहरों सा जिया जाए

नाव किनारे पर खड़ी करके चले आआे,
कुछ पल तसल्ली से लहरों को गिना जाए,
डूबती उतराती और खो जाती किनारों पर,
मौत से पहले हंसती हुई लहरों सा जिया जाए......

अनिल कुमार सिंह.

ज़िन्दगी तुझसे मुहब्बत है

कितना सताया, फिर दुलराया,
हंसते हुए चुपचाप रुलाया,
तूं भी मुहब्बत की तरह निकली
ऐ ज़िंदगी,
मैं तुझसे हार नहीं सकता,
मैं तुझसे जीत नहीं सकता,
एक तूं ही तो मेरी हमसफ़र है,
ऐ ज़िंदगी,
मुझे तुझसे मुहब्बत है.....
मेरे साथ साथ चलना......

अनिल कुमार सिंह.

मैं कविता हूँ

विरासत लुट गई कब की...
बस शेष हैं तो दीवारों पर
सहमी सी कुछ तस्वीरें...
मैं कविता हूँ....
जीना चाहती हूँ...
बस, तस्वीरों पर गर्द ठहरने न पाये....

अनिल

मैं बेवफा नहीं

मैं बेवफा के नहीं, ऐ जमाने तूं सुन ले,
मैंने तेरी तरफ देखा, मुहब्बत बिछुड़ गई....

मैं तेरी मुहब्बत के सिवा कुछ नहीं ऐ दोस्त,
तूं इस कदर से मेरी सांसों में घुल गई.....

अनिल

Sunday, 27 March 2016

वोट बैंक

मर गया?
मर जाने दो,
उसके दर से वोट बैंक का
रास्ता नहीं गुजरता,
सियासत गर्म होने दो,
आम आदमी उबलने दो,
कि सियासत मरने वाले का वर्ग देखती है,
नफे नुकसान और विभव काे देखती है,
मरो या जियो किसे फिक्र है तुम्हारी ,
हॉं, तुम्हारा घर वोट बैंक के रास्ते पर नहीं पड़ता.....

अनिल कुमार सिंह

Thursday, 17 March 2016

दूर रहो मुझसे..

मैं मुहब्बत हूँ, मेरी रूह  से गुजर जाओ,
गर बदन को देखते हो, दूर रहो मुझसे....

मैं आइना हूँ मुहब्बत का, संवर जाओ,
गर  दरार देखते हो ,  दूर रहो मुझसे.....

वो मयखाना हूँ, कि बिन पिये बहक जाओ,
गर शराब मांगते हो, दूर रहो मुझसे....
अनिल