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Sunday, 31 July 2016

रात का आसमां जमीं पर

अपने घने बालों के साये से अंधेरा कर दो,
जुगनुओं को आँचल में सितारों सा सजा लो,
तुम्हारा दमकता हुआ चेहरा, चाँद से कम तो नहीं,
रात का आसमां जमीं पर है, मुहब्बत के लिये...
अनिल

मुझको जीने की चाह दे जाओ

दो घड़ी मेरे पास आ जाओ ,
फिर ख्याल और ख्वाब हो जाओ,
इक लम्हें में उम्र गुजरेगी,
मुझको जीने की चाह दे जाओ....
अनिल

ये चिराग मेरे जुगनुओं के क़ातिल हैं

बुझा दो इन चिरागों को मेरे बुझने से पहले,
ये चिराग मेरे जुगनुओं के क़ातिल हैं,
क्या हुआ जो मौजों से बांध टूट गया,
लहर यकीन की सैलाब से मुकाबिल है.....
तुम्हारी बड़ी उम्मीदें, मेरी छोटी ख्वाहिशें.....
अनिल

मौत.. हमसफ़र


जब टूटते हो तुम,
या हारते हो,
मैं तुम्हारे
सबसे करीब होती हूं,
तुम्हारे राेग में,
विषाद में, वियोग में,
शोक में, दोष में,
तुम्हें सहलाती हूँ मैं,
तुम जानकर भी
अजनबी से
रहते हो मुझसे ,
जिस दिन तुम्हें
हारता देखूंगी खुद से,
तुम्हें सदा के लिए,
गले से लगा लूंगी,
जानना चाहते हो तो सुनोंं,
मैं मौत हूँ,
तुम्हारी,
सिर्फ तुम्हारी,
हमसफ़र.... मौत

अनिल कुमार सिंह

जो याद रहा वो तुम

जो भूल गया वो मैं था,
जो याद रहा वो तुम,
स्वप्नों के अंत सफ़र में,
खुद स्वप्न हो गये गुम,
राहों के घुप्प अंधेरे,
तस्वीर तुम्हारी लेकर,
मेरा उपहास उड़ाते,
फिर हो जाते गुमसुम,
जो भूल गया वो मैं था,
जो याद रहा वो तुम....

अनिल

इक बार गले से मिल तो सही

तूं मदहोश पवन का इक झोंका,
मैं बुझता हुआ सा एक दीया,
तूं आकर अभी बुझा दे मुझे,
इक बार गले से मिल तो सही....

तूं सरिता की चंचल धारा ,
मैं उदास किनारा सूखा सा,
मैं टूट के बह जाऊं इस पल,
आ मुझे बहा ले जा तो सही.....
अनिल कुमार सिंह

अब मुझे मुझसे मुहब्बत है

ये हवा, ये नमीं, ये खुशबुए़ं,
यादों के पर्दों पर दोहराते से चित्र,
रात की बाहों से खुले खुले केश,
डबडबाई आँखें में लहराता सागर,
गर्म आहों को समेटे सिसकता हुआ धुआं,
ओह! आज फिर तुम मेरे ख्वाबों में आई,
आज फिर मेरी छलकी हैं आँखें...
न, न छीनों मुझसे मेरी ही साँसें,
अब मुझे मुझसे मुहब्बत है........

अनिल