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Thursday, 21 May 2015

लाचारी में गला रुँध जाता है

ऊंची ऊंची
अट्टालिकाओं की
जगमगाती रोशनी को
कच्चे घर के ओसारे से ,
खामोश निराश
नज़रों से
झाँकता है ,
अपने घटते हुये
तेल से चिंतित
हाँफता है ...
एक दीपक ,
आँख में नमी लिए हुये...
जलता रहता है ...
पेट्रोल पम्प पर
हॉर्न बजाती
बड़ी बड़ी गाड़ियों को
चुपचाप खड़ा
देखता है ,
राशन की दुकान
पर लाइन में लगा
मिट्टी के तेल का
खाली जरीकेन
खामोशी से
अपनी बारी का
इंतज़ार करता है ,
आँखों में नमी लिए हुये.....
खड़ा रहता है ....
सचमुच
लाचारी में
गला रुँध जाता है दोस्तों ...
लाचारी चिल्लाती नहीं है ,
जहां चिल्लाहट है ,
वहाँ लाचारी नहीं है .....
नम आँखों से तो दिखाई भी कम देता ...