Search This Blog

Tuesday, 5 May 2015

मैं तुम्हें चाँद नहीं कह सकता

तुम्हारे चेहरे को
चाँद सा चेहरा
कह नहीं सकता
नीरस, निरार्द्र ,निर्जीव,
बड़े बड़े गड्ढों से भरा ,
दूसरे की रोशनी से
चमकने वाले की उपमा
तुम्हारे चेहरे को कैसे दे दूँ,
और ये प्यार जिसे तुम
दिल की सौगात समझते हो
वह भी
दिल की नहीं तुम्हारे
चालबाज़ मस्तिष्क की उपज़ है
दिल खोल के
दिखाने का दावा करने वाले,
खुला दिल देखोगे,
तो होश उड़ जाएंगे,
वह चार खंडों में विभक्त
मांस के
रुधिर पम्प के अतिरिक्त
कुछ भी नहीं,
जो शिराओं और
धमनियों के जाल में
रक्त का वाहक है ,
और ये भी सुन लो,
कि ये तारे भी मुझसे टूटने वाले नहीं,
मुझे अपनी हैसियत का अंदाज़ा है
एक बार फिर से सोच लो ,
तुम्हारी कल्पनाएं
मेरे यथार्थ
से मेल नहीं खाती।

अनिल कुमार सिंह