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Saturday, 27 December 2014

मन की बात

निर्द्वन्द्व हैं निरपेक्ष हैं ,शब्दों को नहीं तौलता हूँ ,
शेष नहीं कुछ भी अंतर में, राज़ सारे खोलता हूँ,
मैं हृदय  से बोलता हूँ  .
जो मिला अपना लगा,जो न मिला सपना लगा,
आनंद में एकांत था,आपात में भी शांत था,
साथ निराकार था,जो मिला अपार था,
सपना मेरा साकार था.
वेग के परिवेश में,अपने भावावेश में,
जल कर  कुछ न शेष था,न न्यून मात्र द्वेष था ,
न मन में कोई बात थी ,फिर नयी एक रात थी,
वो तो कल की बात थी। 

अनिल  कुमार सिंह

Monday, 20 October 2014

daideeptya : इस दिवालीस्वार्थ ,लोभ और प्रलोभ के अँधेरे वासनाओ...

daideeptya : इस दिवाली
स्वार्थ ,लोभ और प्रलोभ के अँधेरे
वासनाओ...
: इस दिवाली स्वार्थ ,लोभ और प्रलोभ के अँधेरे वासनाओं के तिमिर मुझको हैं घेरे अंधकारों में ह्रदय भी कांपता है मौत की आहट को भी वह भांपत...

daideeptya : इस दिवालीस्वार्थ ,लोभ और प्रलोभ के अँधेरे वासनाओ...

daideeptya : इस दिवाली
स्वार्थ ,लोभ और प्रलोभ के अँधेरे
वासनाओ...
: इस दिवाली स्वार्थ ,लोभ और प्रलोभ के अँधेरे वासनाओं के तिमिर मुझको हैं घेरे अंधकारों में ह्रदय भी कांपता है मौत की आहट को भी वह भांपत...

इस दिवाली


स्वार्थ ,लोभ और प्रलोभ के अँधेरे
वासनाओं के तिमिर मुझको हैं घेरे
अंधकारों में ह्रदय भी कांपता है
मौत की आहट को भी वह भांपता है
विकृत तमस को हटाने की कला दो
बुझ रहे इस दीप को फिर से जला दो
इसकी ज्योति से हों रोशन और दीपक
बाती में इसके ऐसी स्निग्धता दो
प्रार्थना है इस दिवाली तुमसे ईश्वर
विश्व के आलोक में बस दिव्यता हो .
:-अनिल कुमार सिंह

Sunday, 23 March 2014

खुश हूँ............

बेसब्र हवा सी भागती एक छांव है ,
ज़िंदगी इस ज़िंदगी पर घाव है,
खुद्गर्जी की आबो हवा में धंस रहा हूँ मैं,
हाँ मैं खुश हूँ यहाँ पर ,हंस रहा हूँ मैं .......

Sunday, 3 March 2013

daideeptya : नकली

daideeptya : नकली: गाँधी का चरखा और इनकी  लूट तार तार हो गया चरखे  का सूत, अभिमान और अपमान की पहचान हैं, कैसे कहें ये गाँधी की  संतान है।

नकली

गाँधी का चरखा
और
इनकी  लूट
तार तार हो गया
चरखे  का सूत,
अभिमान
और अपमान
की पहचान हैं,
कैसे कहें ये
गाँधी की 
संतान है।