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Monday, 27 April 2015

त्रासदी

न करना मेरे मालिक ,
अब और मत करना ,
देखा नहीं जाता
सिसकियों का
खंडहरों में
दब के रह जाना,
चहकते बसेरों का
पल में
जमीदोंज हो जाना,
न करना
अब और मत करना..... ,

Friday, 17 April 2015

कौन था वह?

सरकारी सेवा भी किसी मुहब्बत से कम नहीं,न जाने कहाँ - कहाँ ,किन- किन परिस्थितियों का सामना करना  पड़ जाये  ,हर वक़्त तैयार की मुद्रा में रहना पड़ता है,  साल २००९ में  मेरा स्थानांतरण जम्मू कश्मीर के पुंछ नामक कस्बे  में हुआ, पहुँचना जरूर दूभर था ,लेकिन  पहुँचने  के बाद कोई तकलीफ नहीं हुयी।   तीन कमरों वाला सरकारी आवास मिल गया ,जो ऑफिस से लगभग दो किलो मीटर दूरी पर था , ऊपर टीन और एस्बेस्टस का बना छत था,जिसमे कई आज़ाद परिंदों के  घर थे ,उनके उड़ने की आवाज़ टीन  से टकरा कर सन्नाटे में गूंजती थी।  सहयोगियों की कोई कमी नहीं थी,  ड्यूटी सुबह १० बजे से रात १० बजे तक करनी पड़ती थी।  रात में सरकारी वाहन  द्वारा आवास पर पंहुचने के बाद एक गिलास दूध पी कर बिस्तर पकड़ लेते थे , कॉलोनी के पीछे पुलस्त नदी की उछल - उछल कर चलने  की आवाज का मधुर गान, थपकी दे कर सुला देता था ,और सुबह- सुबह अपनी आवाज में परिंदो के सुर घोल कर मुझे उठा भी  देता  था  , हरे भरे पहाड़ों के शीर्ष पर चमचमाती  बर्फ के मकुट भोर होने का प्रमाण देते थे,. अखबार पढ़ने  के बाद चाय से लेकर खाना  बंनाने तक के कार्य और फिर १० बजे से वही ऑफिस -  ऑफिस।
कुछ दिन सब कुछ सामान्य चलता रहा ,लगभग एक महीने बाद से कुछ हैरान करने वाली घटनाएँ होने लगी ,रात में ऑफिस से आने के बाद दूध के भगौने का ढक्कन उठाते, तो उसमे  अक्सर दूध कम या गायब रहता , चलो शायद बिल्ली पी गयी  हो ,बिल्ली के कौशल पर आश्चर्य होता कि  दूध सफाई से पी गयी  और ढक्कन भी नहीं गिरा ,लगता है पहाड़ी बिल्ली ज्यादा ही कुशल होती हों ,यही सोच कर किचन की खिड़की और जाली वाले दरवाजे  को अच्छे से बंद कर देता और  सो जाता।
१३ अगस्त २००९ को भी ऐसे ही आया और थक कर सो गया, मैं  मुख्य द्वार से सबसे अंतिम कमरे में ही सोया करता था , रात में ठण्ड थी सो एक कम्बल को  सहारा बना लिया, रात को लगभग एक बजे ,नदी का शोर स्पष्ट सुनायी दे रहा था ,स्ट्रीट लाइट की रौशनी कांच की खिड़कियों से कमरे को नाइट  लैंप जितना उजाला  दे रही थी , किसी ने  अपने हाथ से मेरे कंधे को हिलाया , गहरी नींद में होने के कारण  सब कुछ महसूस करते हुए भी मैं करवट बदल कर लेट गया ,फिर मेरे कंधे को पकड़ कर जबरदस्ती उठाने वाले अंदाज में झंकझोर दिया , मैं चौक कर कम्बल फेंकते हुए उठा तो देखता हूँ ,कि सफ़ेद पठानी सूट पहने एक लम्बा शख्स मेरे सामने खड़ा है , कौन है? मैं घबराकर जोर से चिल्लाया ,,, वो शख्स पीछे मुड़ा और  लॉबी के रास्ते ड्राइंग रूम से होता हुआ चला गया …   अरे कौन था वह? ओह! शायद आज मुख्य दरवाजे की चिटकनी बंद करना भूल गया … या तो कोई आतंकी छिपने के लिए खुले घर में चला आया ,या  सेक्युरटी गार्ड जो  पठानी सूट पहनता था ,मुझसे यह कहने आया था , कि दरवाजा बंद कर लो ,कुछ पलों में ही सभी संभावनाएं  कौंध गयी ! आतंकी अक्सर रात में नदी के सहारे ही रास्ता तय करते थे ,ऐसा वहां कई लोगों से सुना था ,इसलिए ज्यादा डर लग रहा था।  कुछ देर तक सन्न मारे  खड़ा रहा, फिर सोचा चलो दरवाजा बंद कर ही आते है , लाइट जला  कर ड्राइंग रूम में पंहुच कर देखा कि सभी खिड़की दरवाजे तो अंदर से पुख्ता तरीके से बंद हैं ,खुद  को स्पर्श कर एहसास किया, कि कहीं मैं नींद में तो नहीं हूँ,  नहीं नहीं  मैं नींद में नहीं हूँ , तो फिर ये कौन ,कहाँ से? ....   सवालों  की कौंध से बदन काँप  रहा था , उस पर टीन के छतों से उड़ते परिंदों  की आवाजें और डरा रही थी , चार क्वार्टर का एक ब्लॉक ,उसमें भी मैं अकेला ,मैंने गेट पर लगे पुलिस जवान को फ़ोन करके बुलाया ,आप बीती बताई .... वो कहने लगा, छः साल पहले भी इस घर में जो रहता था, उसके साथ भी ऐसे ही हुआ था साहब ,तब से ये क्वार्टर खाली  ही था , कोई बात नहीं साहब ,सब  बत्तियां  जला  कर सो जाइये!____ वह तो ऐसा  कह कर चला गया , मैं पसीने  से तर- बतर था ,शरीर का तापमान बढ़ गया था ,बहुत तेज़ बुखार था , ठण्ड में भी पसीने से हाल बुरा था, अब इतनी रात में कैसे किसकी नींद ख़राब करूं  ,सोचते सोचते सवेरा हो गया , सहकर्मियों को बात बताई तो ,वे इससे भी ज्यादा भयावह घटनाएँ बताने लगे ,जो इसी क्वार्टर में घटी थीं , उसके बाद मैं उस क्वार्टर में कभी अकेला नहीं रहा और कभी बत्तियां बंद नहीं की. एक साल गुजरने के बाद वापस अयोध्या चला आया.……… कौन था वह?आज भी एक बड़ा सवाल है ,वैसे मैं भूत- वूत को नहीं मानता।  
अनिल कुमार सिंह
सी ३   आकाशवाणी कॉलोनी
बेगमगंज गढ़ैया ,फैज़ाबाद
9336610789

Tuesday, 24 March 2015

बाराती और राहू केतु

राहू और केतु दोनों ही भगवान शिव से  इसलिए नाराज़ हुए कि उन्हें भगवान शिव बाराती बना कर नहीं ले गए थे, दोनों को संतुष्ट करने के लिए भोले शंकर ने आशीर्वाद दिया कि अब जितनी भी बारातें होंगी तुम दोनों उस बारात के हर बाराती पर सवार रहोगे ,दोनों इतना बड़ा आशीर्वाद पा कर बड़े खुश हुए ,और बिना बताये चुपचाप हर बाराती पर सवार होने लगे और आजतक होते है  ,जरा सोचिये की बरात में जाने के लिए तैयार होने वाला वो बाराती जो एक दिन पहले ही अपने कपड़ों को ड्राई क्लीन  करवा कर पहनता है, भला नागिन डांस पर सड़क या कच्चे रास्ते पर लोट पॉट होते समय,  उसको उन   कपड़ों का ख्याल कहाँ चला जाता है. जो  उम्र भर कभी नहीं नाचा वह भी साईकिल में हवा भरने वाला या पतंग  डांस जरूर करता है, सिम्पली चलते समय देखिये चाल में मंदता और तनाव उस पर गर्दन एकदम सीधी तनी हुयी ,बुज़ुर्ग  भी अपने गमछे को कंधे पर बार बार सँभालते हुए सफ़ेद मूंछों पर ताव देते नज़र आते है जैसे सब उन्ही को देख रहे हों ,सब बारातियों पर मस्ती का आलम ऐसा होता है की दूल्हा बेचारा पीछे ही छूट जाता है ,महिलायें भी जहाँ बारात में शिरकत करती है उनकी तो बात ही  न पूँछिये ,जिस मेकअप को कुछ देर पहले बहुत  अच्छा और महंगा वाला  कहते हुए पुतवाया था वह बार बार टिश्यू पेपर या रुमाल की भेंट चढ़ जाता है ,क्या करें डी जे की धुन इतना नचाती है कि सर्दी में भी पसीना आ जाता है ,गरमी की तो बात ही छोड़ दीजिये ,एक गाना शुरू नहीं होता की दूसरे की फरमाइश हो जाती है ,जाड़े में पतली साड़ी  में भी ठण्ड नहीं लगती , शॉल ली भी तो कंधे पर दिखाने के लिए ,द्वार पूजा पर पंहुचते ही तो राहू केतू का असर और ही बढ़ जाता है, बड़ी जोर की भूख लगने लगती है भाई ,फिर क्या जितना रोज़ खाते है उसका तीन गुना खाने के बाद भी लगता है की ,अभी तो सारे स्टाल पर नहीं जा पाये ,खाना खाते ही तो  राहु केतु शांत हो जाते हैं मानो उन्हें भोग लगा दिया गया ,फिर कोई बिस्तर ढूंढता नज़र  आता है, कोई घर वापसी की तैयारी करता है ,सारा सुरूर उतर जाता है, बाराती वाली चाल भी चुश्त  हो जाती है ,शादी तो होनी ही है हो ही जाती है ......... राहू केतु की अनजाने में बहुत सेवा हो जाती है ......

Tuesday, 17 March 2015

मेरे हाथों की मेहंदी की गुज़ारिश है ,
तुम अपनी चौखट फूंलों से सजा लेना
दरों दीवारों को स्याह रंगवा देना,
मैंने आँचल में सितारे जड़ा रखे हैं ,
नमी वाली रात- रानी की खुशबू में
यूँ महसूस का सकूँ मैं अपने चाँद को ,
छू लेने को बेताब नरम हथेलियों   से ,
....जिसे अब तलक बस दूर से देखा है .......

अनिल कुमार सिंह

Thursday, 12 March 2015

बरास्ता दिल से

तेरी याद जो रग रग  में
समाई है लहू बन कर ,
बरास्ता दिल से
गुजरती है हरदम  ……
वो पल जो करीब आ कर
बिताये थे हमने ,
अनायास ही
उम्र बढ़ा  गए मेरी  ..
भुला देने का वादा 
पूरा करें भी तो कैसे ?
धड़कने लिखा करती  हैं ,
तेरा नाम
मैं जहाँ से गुजरता हूँ …………

अनिल कुमार सिंह

Tuesday, 3 March 2015

कमबख्त ये रंग

वो सारे रंग ,
सहेज कर रखे  हैं मैंने ,
जिन्हें बड़े ऐतबार से 
तुमने सौंप दिया था मुझे 
तुम्हारी रंगो  से 
लिपटी हुयी
 नाज़ुक हथेलियों से
मेरे हाथों में,
अब ,कहीं हलके न पड़ जाये
 यही सोच कर
मैं होली नहीं खेलता ,
कमबख्त ये रंग
बाज़ार में नहीं मिलते ,
और तुम भी तो मुझसे दूर चली गयी ..