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Sunday, 31 July 2016

आलिंगन है कहाँ जरूरी ?

गगन धरा का मिलन
कब हुआ था?
कब हुआ है?
भ्रम ही था , कि
दूर क्षितिज पर,
गगन ये
धरती से मिलता है ,
हाँ!
गगन के स्वप्नों से ही
धरती ने
श्रृंगार किया है ,
सजल गगनमेघों ने
झुक कर ,
धरती को
प्रतिप्यार  दिया है.,
रही परस्पर
निश्चित दूरी,
आलिंगन है
कहाँ जरूरी .....

तुम स्वप्न ,मैं सत्य

केश राशि आकाश सी विस्तृत,
मस्तक पर है चाँद का टीका,
सजे हुये आँचल पे सितारे,
शीतल मद बयार की खुशबू,
आसमान में तुम छाई हो ,,,,,

फिर दूर कहीं दिखता है मुझको,
एक बड़े तालाब किनारे,
विशाल सूखा वृक्ष अकेला,
निर्जीव नीड़ लिए बाहों में,
मुझको लगता मेरे जैसा ,

आसमान क्यों स्वप्न दिखाता,
धरती कितना सत्य .......
तुम मेरे लिए स्वप्न हो सचमुच ,
मैं मेरे लिए सत्य .......





भूख है या है मुहब्बत

भोर की पहली किरण से,
मुस्करा कर खिल गई,
फिर हुआ मदहोश भँवरा ,
भूख है या है मुहब्बत,,,,,,,

जल में जल की प्यासी सीपी,
मुंह खोलती एक बूंद को ,
और पनपता एक मोती,
भूख है या है मुहब्बत.....

तड़ित तरंगों के चुंबन और,
श्यामवर्ण आकाश के बादल ;
प्यास बुझाते हैं धरती की ,
भूख है या है मुहब्बत ....

भूख मुहब्बत के पहले चलती है,
जहां भूख है, मुहब्बत वहाँ पलती है ........



सुनो गगन !

सूखा दिन झुलसा, सूरज का बोझ उठा कर,
थकी शाम आतुर है रात जलाने को ,
आँख के आँसू कम पड़ते हैं,सुनो गगन !
बरसा दो तुषार ,आग बुझाने को ,
झुलसे पर्णों, झुलसे स्वप्नों को, दे दो जीवन,
जल चुकी सुगंधि, फिर महका दो मन उपवन ,
मंद रहे शीतल बयार, शोर न मचने पाये,
शाख के पंछी को पत्तों की चोट न लगने पाये,
सूरज के उगने से पहले रात न जगने पाये..........
सुनो गगन !

अनिल

चिनाब और चिनारों की रौनक चली गयी

सांस घुटती है खुले आसमां के तले,
चीखों के दरवाज़ो पर ये ताले कैसे,
देवदार के सीने पर गोलियों के निशां,
आंसुओं से उफनते ये नाले कैसे,
कब पिघलेगी न जाने ये बर्फ बारूदी,
चिनाब और चिनारों की रौनक चली गयी,
संगीनों के साये में मुहब्बत हो भी तो, हो कैसे ..
पत्थरों की जगह फूल उठाओ तो कोई बात बने...

अनिल

करगिल ...

खूँ से अपने जहां लिख दिया था “जय हिंद“,
शहीदों के उन निशानों को, हम मिटने नहीं देंगे,
बेशक चले जाओ जहां है तुम्हारी जन्नत,
ये ज़मीं जन्नत है हमारी, हरगिज़ नहीं देंगे,
गर मादरे वतन से तुमको नहीं मुहब्बत,
कसम शहीदों की, तुम्हें जीने नहीं देंगे.......
अनिल

झोलियों में स्वप्न

झोलियों में स्वप्न लादे,
शांत चित्त में लक्ष्य साधे,
वज्र कर अपने इरादे,
चल पड़े हम भी अभागे,
आत्मा आकाश कर लें ,
खुद को इक संसार कर लें,
प्रेम की सरिता बहाकर ,
जिंदगी साकार कर लें ..
रास्ते कब तक छलेंगे ,
मरते दम तक हम चलेंगे,
जब ये तन निर्जीव होगा,
दीप बनकर हम जलेंगे.
अनिल