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Sunday, 13 March 2016

ताबूतों के लिए तिरंगा सुरक्षित है

मैंने देखा है ,
सरहद पर पिघलते बारूदों को,
बेबसी में बिलखते ताबूतों को,
खून से सने कपड़ों ,
और मोर्टार के टुकड़ों पर ,
हाँ, उन पर लिखा देखा है मैंने ,
"कि आज़ादी यहीं से जन्म लेती है "

और जवान होती है वही आज़ादी,
बेफिक्र चोर उचक्कों में ,
धोनी के छक्कों में ,
आग लगाते आंदोलन में,
धरनों और प्रदर्शन में,
लाल बत्ती के काफिलों में,
विजयपथ की महफ़िलों में,
सरे आम अत्याचारों में,
मासूमों से बलात्कारों में,
जे एन यू के नारों में ,
हाँ ,जवां आज़ादी खुद को ढूंढती है,
और फिर देखता हूँ ,
लाल चौक के लिए तिरंगा रोता है,
"भारत माँ की जय" का नारा सुबकता है ,
बस्तर के जंगलों में ,
देखता हूँ बारूदी सुरंगों को,
जिस पर लिखा है ,
" आज़ादी यहाँ दम तोड़ती है"
हाँ, ताबूतों के लिए तिरंगा सुरक्षित है.. .........
अनिल कुमार सिंह.