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Thursday, 9 July 2015

मैं कवि नहीं ,लेखक नहीं

अन्तर्मन के द्वंद्वो को
सीधे और सरल शब्दों में,
निष्काम भाव से मैं लिखता हूँ
मैं कवि नहीं ,लेखक नहीं ,
लिखने भर को बस लिखता हूँ।
साहित्य व्योम के अगिनित तारे ,
प्रेरित करते हैं ये सारे ,
कोई चमकता ,कोई टूटता ,
कोई समूह बना कर चलता ,
कोई बिखरता जर्रा जर्रा ,
धरती से देखा करता हूँ ....
मैं कवि नहीं ,लेखक नहीं ,
लिखने भर को बस लिखता हूँ।
मेरे अपने मेरे सपने
कुछ छूटे कुछ साथ बचे हैं ,
उड़ सकने को पंख नहीं थे,
फिर भी कुछ अरमान बचे हैं,
अरमानो के इस जुगनू को ,
दिन में भी देखा करता हूँ ,
मैं कवि नहीं ,लेखक नहीं ,
लिखने भर को बस लिखता हूँ।
अनिल