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Monday, 28 December 2015

बीते वर्ष

लगा रहने दो अपने ,
बेवज़ह
मुस्कराते हुये
मुखौटे को ,
तुम्हें देख कर
रूह
कांप जाती है मेरी ,
तुम्हारी हंसी में
जाने कितनी
चीख़ों के दर्द हैं ,
फटी हुयी ज़मीं की
घबराहट है ,
अपनो से
बिछुड़ने के ग़म हैं ,
खेतों की फटी
बिवाइयाँ हैं ,
और खूनी फसलें भी
जो तुमने उगाई थी
अपने हाथों से ,
अपनी जेबों में
भरे बारूद को भी
अपने साथ ले जाओ ,
अब बस! चले जाओ!
चले जाओ !
मैं नहीं देख सकता
बीते वर्ष ,
बहुत रुलाया है तुमने,
लगा रहने दो अपने
मुखौटे को,
मैं तुम्हारा
असली चेहरा
नहीं देख सकता ......

अनिल कुमार सिंह